Sunday, May 4, 2014

माँ भी कुछ कहना चाहती है....




याद है माँ?
जब बाबूजी थे तो शाम के वक्त
जमघट लगता था 
एक चौपाल सा सजता था....
घेर बाँध हम सब बैठते थे
फिर सुनाते थे बाबूजी
कोई किस्सा... गुज़रे ज़माने का
या चुनते थे कोई मोती ‘धर्मयुग’ या ‘सारिका’ से
कितना अच्छा बोलते थे बाबूजी
छोटका तो तुम्हारी गोद में सर रखकर सुनता था
और फिरती रहती थी तुम्हारी उँगलियाँ उसके घने उलझे बालों में....  

अब जब तुम कुछ कहने आती हो
तो बन्द कमरों के बाहर
देर तक यूँ ही खडी रहती हो
और बिना कुछ कहे वापस लौट जाती हो
फिर समेट कर रख देती हो सारी बातें
एक दूसरे के ऊपर तह लगा कर
यादों की मेज़ पर    
कि खुले दरवाजे बेटे-बहू के बंद कमरों के
तो कह लेंगे
या हटे कान से सटे मोबाइल
बालकनी के कोने में खडी घर की लडकियों के
तब कह लेंगे
या फिर उठे ऊपर लैप टॉप में सर घुसाए लडकों की आँखें 
तो कह लेंगे

रात भर इंटरनेट में चैटिंग के बाद उठने के वक्त सोए 
और सोने के समय जागे लडके-लडकियों से
कहने-सुनाने की तमाम बातें
यूँ ही जमा करती जा रही हो तुम
शायद कभी वक्त की गर्द हटा सुन ले कोई....

या बेमतलब की मान
यूँ ही दम तोड देगी तुम्हारी आवाज़.... !!  

25.4.2014

Monday, March 31, 2014

बचपन की दोस्ती


उफक में खेल रहे हैं आँख मिचौली का खेल तीनों
इनकी दोस्ती बचपन की है
लाख झगडे होने पर भी टूटती ही नहीं

खूब खिझाते दोनों मिलकर सूरज को
कभी पहाड ढँक लेता उसे 
तो कभी बादल

बडा ढीठ है वह,
अपनी हज़ार गज की चादर में लपेट लेता उसे  
गुस्से में सूरज, उझल देता रंगों की बाल्टी
उसकी देह पर
कभी गुलाबी तो कभी टह-टह लाल
या मल देता उसके चेहरे पर गुलाल
तब जाकर कहीं सतरंगी बादल  
ज़रा सी चादर हटाता    

फिर झाँकता सूरज 
लाल-लाल गोल-गोल मुँह लिए
उसकी रोशनी में नहाया हुआ बादल,
ख़ुश हो कर अपनी हज़ार बाँहों में भर लेता उसे 
कहता ‘शुक्रिया ऐ मेरे दोस्त मुझमें रंग भरने के लिए’  

थक जाता सूरज इस खेल में
फिर चल पडता पश्चिम में अपने एक और साथी से मिलने
जिसकी गोदी में सर रख कर सोएगा रात भर
दिन भर का थका-हारा
बेचारा ....

फिर पहाड भी सर उठा कर दमकता रहता दिन भर
और देखता रहता उसे धीरे-धीरे दूर होते

सन व्यू प्वायंट पर जमा लोग फिर दुआ माँगते 
ख़ुदा करे
सलामत रहे
इनकी दोस्ती उम्र भर ...!!



........................... नेपाल में धरान की पहाडियों से सूर्योदय देखते वक्त सोची गई यह कविता 23.3.14.  

Friday, February 7, 2014

जुडवा भाई



इक ब्राह्मण ने कहा था कि चरखी है मेरे पाँव में
घूमता रह जाऊँगा जिन्दगी भर शहर और गाँव मैं

ना मिलेगा चैन और विश्राम घर की छाँव में
जो सुकून होता है हासिल हर किसी ठहराव में

उत्तर दक्षिण पूरब पश्चिम कुछ भी नहीं रहा बाक़ी
इस तरह ज़िन्दगी भर सिर्फ ख़ाक ही तो है फाँकी

पर देखा मेरी आँखों ने हर तरफ एक वाक़या
क्या अमीर  और क्या गरीब क्या शहर और गाँव क्या  

हर शहर मुझको लगे के जैसे जुडवा भाई हों    
हर चीज अपनी सी लगी जैसे नहीं पराई हो

हर गाँव में हर शख़्स का एक सा चेहरा मिला
'धनिया' मिली हर झोंपडी में और खेत में 'होरी' मिला

भूख की तडप वही तो जद्दोज़हद भी एक सी
आँखों में सपने एक से और मुस्कुराहटें एक सी  

ख़ुशबू हवा की एक सी और धूप-बदली एक सी  
और मिलती थी दरख़्तों की भी शक्लें एक सी

सबके चेहरे एक से और सबका किस्सा एक सा
इस तरह अजनबी कहीं भी कोई मुझको न मिला


 6.2.2014 

Monday, January 27, 2014

मौसम का मिजाज


इस मौसम का मूड दिन भर न जाने कितनी बार बदलता है !
आज सबेरे ही सारे शहर को ढक रखा था
कोहरे की सफेद चादर में
जब मैं ट्रेन से उतरा था !!

स्कूल की बस खड्ड में गिर न जाए कहीं
कर गया छुट्टियाँ स्कूल-कॉलेजों में
बारह बजे अचानक बदली का शॉल हटा झाँका सूरज
कोहरे की चादर तहिया कर 
रख दिया आसमान के किसी वार्डरोब में कल के लिए....

दो बजे धूप में घरों की छत पर सूखने लगे कपडे
मजिस्ट्रेट कोसने लगे उसको कि    
तीन बजते-बजते चलने लगी तेज हवाएँ
बारिश की बौछारों में फिर पडने लगे ओले भी
चार बजे ही रात का आलम था
फिर शाम से ही मुँह फुलाए करवट बदल
सो गया बिन कुछ खाए
मना कर गया कोई बत्ती न जलाए
‘माइग्रेन’ है उसको...
बत्ती आँख में चुभती है  
इस मौसम का मूड दिन भर न जाने कितनी बार बदलता है..!

  


कुछ कम्प्यूटरी कविताएँ


1.

चलो न एक ‘आईडी बनाएँ
अपना नाम छिपाएँ
भेजें एक दूसरे को ‘फ्रेंड रिक्वेस्ट’
’फेसबुक’ पर
फिर खूब करें हम
प्रेम की बातें

तुम्हारे दिल में भी तो दबी होंगी
सदियों पुरानी छटपटाहट
कि कोई तो हो
रख दें जिसके सामने अपना दिल खोलकर
आओ तोड दें हम
वर्जनाओं की ज़जीरें
एक ‘क्लिक’ के साथ
और देखें एक दूसरे का ‘टाइमलाइन’
के इतने दिनों में कितना बदल चुके हम
अभी भी वैसे ही ‘ग्लो’ करती हो तुम
या सिलवटें पडने लगी हैं चेहरे पर
तुम्हें भी तो ख़्वाहिशें होंगी जानने की कुछ
वक्त के थपेडों में वक्त के पहले ही
सफेदी आ चुकी कब की बालों में
नज़दीक का चश्मा भी चढ गया है आँखों पर
हमें कहाँ कभी भी किसी ने सुना,
पहले बाप-दादा, अब बच्चों की सुन रहे हम
आओ सुनाएँ एक-दूसरे को दिल की बातें 
पूरा करें साथ दरिया के किनारे बैठकर
'सनसेट' देखने का तसव्वुर
‘मज़ा आता अगर बीती हुई बातों का अफसाना
कहीं से तुम  बयाँ करते, कहीं से हम बयाँ करते’
आओ न ...
एक आई डी बनाएँ...!!

2.
क्यों चौंक रही हो तुम,
मेरे फेसबुक में नौ सौ बत्तीस ‘फ्रेंड्स’ देखकर
इनमें चार सौ पचपन लडकियाँ हैं इसलिए?
अरे नहीं... ये सब तो यूँ ही मुझसे जुडी हैं
जैसे औरों से भी जुडी होंगी
ये सब झूठे हैं
शायद नाम भी झूठे हों
और तस्वीर भी किसी और की लगा ली हो शायद...

मैं भी कहाँ सच्चा हूँ
क्या नहीं हो सकता है कम्प्यूटर में ?
तुम भी जुड जाओ न मुझसे ‘करीना’ बनकर
मैं भी ‘सैफ’ की तस्वीर ‘कॉपी’ और ‘पेस्ट’ कर दूँगा
अपनी जगह
फिर तलाशेंगे एक दूसरे में सच्चे दोस्त की तस्वीर
रोज़ाना
देर रात तक ‘इंटरनेट’ खोल कर

3.
कितना अच्छा लगेगा जब
मेरी डाली हुई ‘सनसेट’ या चिडिया या किसी फूल की तस्वीर को
‘लाइक’ करोगी तुम
या किसी लिखी हुई किसी साधारण सी बात पर भी
'कमेंट’ में लिखोगी ‘सुपर्ब’ या ‘2गुड’
कहाँ कोई किसी की तारीफ करता है मुँह पर
और पीठ पीछे तो रवायत ही है शिकायत की 
भला हो ‘ज़ुकरबर्ग’ का
जो है सामने है
पता है?
अब मौत की ख़बरें देने पर भी
आने लगे हैं मित्रों के ‘लाइक’
अम्मा की मौत की ख़बर डाली थी ‘फेसबुक’ में
कुल बत्तीस ‘लाइक’ आए थे
कहाँ मिलते हैं अब काँधे अर्थी उठाने वास्ते
या सर रख कर रोने के लिए
‘लाइक’ और ‘कमेंट की संख्या गिन
ख़ुश हो लेना ही काफी है
कि शरीक हैं इतने लोग
मातमपुर्सी में....!!






Sunday, January 12, 2014

कोहरा

1. 
  
घना कोहरा है
बह रही हैं तेज बर्फीली हवाएँ भी
कल ही बर्फ गिरी थी बारिश में
लोग दुबके हुए हैं
अपने-अपने मकानों में

स्टेशन के बाहर ही है एक चाय की दुकान
सबेरे सवा छ: बजे
वक्त हो चला है ट्रेन का
मजदूर उतरेंगे ट्रेन से,
सबेरे की चाय की तलब
खींच लाएगी उन्हें
दुकान पर

यही वक्त है रामदीन के लिए बिजनेस पकडने का
‘मिस’ किया तो फिर फाका रहेगा सारा दिन
वक्त है लोगों के घर में रहने का, 
सोए रहने का ओढ कर गर्म रजाई  
या ब्लोअर की गर्म हवाओं में
सर्दी है बाहर अभी
शीत लहर है

पर फटी गंजी में है रामदीन
चूल्हे में कोयला डाल
पंखे से हवा कर रहा है आँच को
कि जल्दी लहक जाए चूल्हा
और बुझ जाए जठर की आग उसकी आज के दिन
सिग्नल हो चुका है ट्रेन का..! 

2.

लिपटा सोया है शहर
सफेद दुधिया चादर में कुहासे की
सामने का घर भी नहीं दीखता
सडकें, पेड, मकान और बादल सब मिल कर हो गये हैं एक
कि अल्लसुबह पेपर वाला देता अख़बार फेंक
बालकनी में
लहरा के अपने हाथ एक साइकिल पर सवार होकर
गुजरते कॉलोनी की हर गलियों से
आगाह करता, ठंढ बहुत है
ख़बरें छपी हैं मौत की
शीत लहर से लोगों की... 

3


घने कोहरे के बीच
स्टेशन पर बैठे इक्के-दुक्के सिकुडे लोग  
चरखी बन पेट में पैर और मुँह घुसाए चन्द कुत्ते
कल ही बर्फ गिरी थी बारिश में
लोग दुबके हुए हैं
अपने-अपने मकानों में
ठंढ से बेखबर
खेल रहे हैं बच्चे
पुआल की ढेर पर
मुँह से भाप निकालते और कहते
देखो मैंने बढा दिया है कोहरा आसमान में.... 




Friday, January 3, 2014

उजडी हवेली



माँ के कहने पर बरसों बाद आया था गाँव
देखने अपने पुरखों के मकान और बुज़ुर्गों की ज़मीनें 
खडा एक-टक देख रहा था गाँव का वह मकान
जहाँ रौनकें हुआ करती थी कभी

पर अब हैं झडते प्लास्टर, चटकी दीवारें,
टूटे हुए छज्जे और उखडे हुए खिडकी के पल्ले
दरारों से निकलते बरगद और पीपल के पौधे

जंग लगे पुराने ताले को खोल कर
दाखिल हुआ अपने पुश्तैनी मकान में 
कबूतरों के बीट से पटा हुआ था फर्श
और अर्श पर उलटे लटके मिले थे कुछ चमगादड 
मकडों के जाले हटाते मैं पहुँचा आँगन में
जहाँ मंडप बने थे कभी
और हुई थी शादियाँ बुआओं की
और मेरा यज्ञोपवीत संस्कार

मत रो माँ... क्या हुआ जो उजड गया इक रैन बसेरा
खुश रहो कि अब यहाँ परिन्दों ने डाल रखा है डेरा


01.01.2014 

Wednesday, January 1, 2014

ऐसा कुछ भी तो नहीं हुआ

2.      

ऐसा कुछ भी तो नहीं हुआ था जैसा फिल्मों में अक्सर होता है
न ही किसी अस्पताल के मेट्रन ने डॉक्टर से पूछा था
कि वह कब अच्छा हो जाएगा...
न ही कोई डॉक्टर सर झुकाए ओ.टी. से बाहर निकला था
और न ही किसी डॉक्टर के चेहरे पर चिंता की रेखा उभरी थी

बस एक शाम एक डॉक्टर आया था 
और निकाल दी थी उसने
नसों में चढते पानी की सूई
कि चलते फिरते लहू में ही
चढते पानी की रवानी है  
क्यों यह पानी ज़ाया हो
जब रगों में दौडते-फिरते लहू ने 
बन्द कर दिया हो चलना
और उखड गई हों साँसें उसकी

 (बाबूजी की मृत्यु पर)