Friday, February 7, 2014

जुडवा भाई



इक ब्राह्मण ने कहा था कि चरखी है मेरे पाँव में
घूमता रह जाऊँगा जिन्दगी भर शहर और गाँव मैं

ना मिलेगा चैन और विश्राम घर की छाँव में
जो सुकून होता है हासिल हर किसी ठहराव में

उत्तर दक्षिण पूरब पश्चिम कुछ भी नहीं रहा बाक़ी
इस तरह ज़िन्दगी भर सिर्फ ख़ाक ही तो है फाँकी

पर देखा मेरी आँखों ने हर तरफ एक वाक़या
क्या अमीर  और क्या गरीब क्या शहर और गाँव क्या  

हर शहर मुझको लगे के जैसे जुडवा भाई हों    
हर चीज अपनी सी लगी जैसे नहीं पराई हो

हर गाँव में हर शख़्स का एक सा चेहरा मिला
'धनिया' मिली हर झोंपडी में और खेत में 'होरी' मिला

भूख की तडप वही तो जद्दोज़हद भी एक सी
आँखों में सपने एक से और मुस्कुराहटें एक सी  

ख़ुशबू हवा की एक सी और धूप-बदली एक सी  
और मिलती थी दरख़्तों की भी शक्लें एक सी

सबके चेहरे एक से और सबका किस्सा एक सा
इस तरह अजनबी कहीं भी कोई मुझको न मिला


 6.2.2014 

Monday, January 27, 2014

मौसम का मिजाज


इस मौसम का मूड दिन भर न जाने कितनी बार बदलता है !
आज सबेरे ही सारे शहर को ढक रखा था
कोहरे की सफेद चादर में
जब मैं ट्रेन से उतरा था !!

स्कूल की बस खड्ड में गिर न जाए कहीं
कर गया छुट्टियाँ स्कूल-कॉलेजों में
बारह बजे अचानक बदली का शॉल हटा झाँका सूरज
कोहरे की चादर तहिया कर 
रख दिया आसमान के किसी वार्डरोब में कल के लिए....

दो बजे धूप में घरों की छत पर सूखने लगे कपडे
मजिस्ट्रेट कोसने लगे उसको कि    
तीन बजते-बजते चलने लगी तेज हवाएँ
बारिश की बौछारों में फिर पडने लगे ओले भी
चार बजे ही रात का आलम था
फिर शाम से ही मुँह फुलाए करवट बदल
सो गया बिन कुछ खाए
मना कर गया कोई बत्ती न जलाए
‘माइग्रेन’ है उसको...
बत्ती आँख में चुभती है  
इस मौसम का मूड दिन भर न जाने कितनी बार बदलता है..!

  


कुछ कम्प्यूटरी कविताएँ


1.

चलो न एक ‘आईडी बनाएँ
अपना नाम छिपाएँ
भेजें एक दूसरे को ‘फ्रेंड रिक्वेस्ट’
’फेसबुक’ पर
फिर खूब करें हम
प्रेम की बातें

तुम्हारे दिल में भी तो दबी होंगी
सदियों पुरानी छटपटाहट
कि कोई तो हो
रख दें जिसके सामने अपना दिल खोलकर
आओ तोड दें हम
वर्जनाओं की ज़जीरें
एक ‘क्लिक’ के साथ
और देखें एक दूसरे का ‘टाइमलाइन’
के इतने दिनों में कितना बदल चुके हम
अभी भी वैसे ही ‘ग्लो’ करती हो तुम
या सिलवटें पडने लगी हैं चेहरे पर
तुम्हें भी तो ख़्वाहिशें होंगी जानने की कुछ
वक्त के थपेडों में वक्त के पहले ही
सफेदी आ चुकी कब की बालों में
नज़दीक का चश्मा भी चढ गया है आँखों पर
हमें कहाँ कभी भी किसी ने सुना,
पहले बाप-दादा, अब बच्चों की सुन रहे हम
आओ सुनाएँ एक-दूसरे को दिल की बातें 
पूरा करें साथ दरिया के किनारे बैठकर
'सनसेट' देखने का तसव्वुर
‘मज़ा आता अगर बीती हुई बातों का अफसाना
कहीं से तुम  बयाँ करते, कहीं से हम बयाँ करते’
आओ न ...
एक आई डी बनाएँ...!!

2.
क्यों चौंक रही हो तुम,
मेरे फेसबुक में नौ सौ बत्तीस ‘फ्रेंड्स’ देखकर
इनमें चार सौ पचपन लडकियाँ हैं इसलिए?
अरे नहीं... ये सब तो यूँ ही मुझसे जुडी हैं
जैसे औरों से भी जुडी होंगी
ये सब झूठे हैं
शायद नाम भी झूठे हों
और तस्वीर भी किसी और की लगा ली हो शायद...

मैं भी कहाँ सच्चा हूँ
क्या नहीं हो सकता है कम्प्यूटर में ?
तुम भी जुड जाओ न मुझसे ‘करीना’ बनकर
मैं भी ‘सैफ’ की तस्वीर ‘कॉपी’ और ‘पेस्ट’ कर दूँगा
अपनी जगह
फिर तलाशेंगे एक दूसरे में सच्चे दोस्त की तस्वीर
रोज़ाना
देर रात तक ‘इंटरनेट’ खोल कर

3.
कितना अच्छा लगेगा जब
मेरी डाली हुई ‘सनसेट’ या चिडिया या किसी फूल की तस्वीर को
‘लाइक’ करोगी तुम
या किसी लिखी हुई किसी साधारण सी बात पर भी
'कमेंट’ में लिखोगी ‘सुपर्ब’ या ‘2गुड’
कहाँ कोई किसी की तारीफ करता है मुँह पर
और पीठ पीछे तो रवायत ही है शिकायत की 
भला हो ‘ज़ुकरबर्ग’ का
जो है सामने है
पता है?
अब मौत की ख़बरें देने पर भी
आने लगे हैं मित्रों के ‘लाइक’
अम्मा की मौत की ख़बर डाली थी ‘फेसबुक’ में
कुल बत्तीस ‘लाइक’ आए थे
कहाँ मिलते हैं अब काँधे अर्थी उठाने वास्ते
या सर रख कर रोने के लिए
‘लाइक’ और ‘कमेंट की संख्या गिन
ख़ुश हो लेना ही काफी है
कि शरीक हैं इतने लोग
मातमपुर्सी में....!!






Sunday, January 12, 2014

कोहरा

1. 
  
घना कोहरा है
बह रही हैं तेज बर्फीली हवाएँ भी
कल ही बर्फ गिरी थी बारिश में
लोग दुबके हुए हैं
अपने-अपने मकानों में

स्टेशन के बाहर ही है एक चाय की दुकान
सबेरे सवा छ: बजे
वक्त हो चला है ट्रेन का
मजदूर उतरेंगे ट्रेन से,
सबेरे की चाय की तलब
खींच लाएगी उन्हें
दुकान पर

यही वक्त है रामदीन के लिए बिजनेस पकडने का
‘मिस’ किया तो फिर फाका रहेगा सारा दिन
वक्त है लोगों के घर में रहने का, 
सोए रहने का ओढ कर गर्म रजाई  
या ब्लोअर की गर्म हवाओं में
सर्दी है बाहर अभी
शीत लहर है

पर फटी गंजी में है रामदीन
चूल्हे में कोयला डाल
पंखे से हवा कर रहा है आँच को
कि जल्दी लहक जाए चूल्हा
और बुझ जाए जठर की आग उसकी आज के दिन
सिग्नल हो चुका है ट्रेन का..! 

2.

लिपटा सोया है शहर
सफेद दुधिया चादर में कुहासे की
सामने का घर भी नहीं दीखता
सडकें, पेड, मकान और बादल सब मिल कर हो गये हैं एक
कि अल्लसुबह पेपर वाला देता अख़बार फेंक
बालकनी में
लहरा के अपने हाथ एक साइकिल पर सवार होकर
गुजरते कॉलोनी की हर गलियों से
आगाह करता, ठंढ बहुत है
ख़बरें छपी हैं मौत की
शीत लहर से लोगों की... 

3


घने कोहरे के बीच
स्टेशन पर बैठे इक्के-दुक्के सिकुडे लोग  
चरखी बन पेट में पैर और मुँह घुसाए चन्द कुत्ते
कल ही बर्फ गिरी थी बारिश में
लोग दुबके हुए हैं
अपने-अपने मकानों में
ठंढ से बेखबर
खेल रहे हैं बच्चे
पुआल की ढेर पर
मुँह से भाप निकालते और कहते
देखो मैंने बढा दिया है कोहरा आसमान में.... 




Friday, January 3, 2014

उजडी हवेली



माँ के कहने पर बरसों बाद आया था गाँव
देखने अपने पुरखों के मकान और बुज़ुर्गों की ज़मीनें 
खडा एक-टक देख रहा था गाँव का वह मकान
जहाँ रौनकें हुआ करती थी कभी

पर अब हैं झडते प्लास्टर, चटकी दीवारें,
टूटे हुए छज्जे और उखडे हुए खिडकी के पल्ले
दरारों से निकलते बरगद और पीपल के पौधे

जंग लगे पुराने ताले को खोल कर
दाखिल हुआ अपने पुश्तैनी मकान में 
कबूतरों के बीट से पटा हुआ था फर्श
और अर्श पर उलटे लटके मिले थे कुछ चमगादड 
मकडों के जाले हटाते मैं पहुँचा आँगन में
जहाँ मंडप बने थे कभी
और हुई थी शादियाँ बुआओं की
और मेरा यज्ञोपवीत संस्कार

मत रो माँ... क्या हुआ जो उजड गया इक रैन बसेरा
खुश रहो कि अब यहाँ परिन्दों ने डाल रखा है डेरा


01.01.2014 

Wednesday, January 1, 2014

ऐसा कुछ भी तो नहीं हुआ

2.      

ऐसा कुछ भी तो नहीं हुआ था जैसा फिल्मों में अक्सर होता है
न ही किसी अस्पताल के मेट्रन ने डॉक्टर से पूछा था
कि वह कब अच्छा हो जाएगा...
न ही कोई डॉक्टर सर झुकाए ओ.टी. से बाहर निकला था
और न ही किसी डॉक्टर के चेहरे पर चिंता की रेखा उभरी थी

बस एक शाम एक डॉक्टर आया था 
और निकाल दी थी उसने
नसों में चढते पानी की सूई
कि चलते फिरते लहू में ही
चढते पानी की रवानी है  
क्यों यह पानी ज़ाया हो
जब रगों में दौडते-फिरते लहू ने 
बन्द कर दिया हो चलना
और उखड गई हों साँसें उसकी

 (बाबूजी की मृत्यु पर)

ऐसा कुछ भी तो नहीं हुआ

1
ऐसा कुछ भी तो नहीं हुआ था जैसा फिल्मों में होता है
न फोटो गिरा, न दीया बुझा
न लौ ही थरथराई थी आँगन में
न ही किसी परिन्दे के उडने की फडफडाहट
देर तक गूँजी थी कानों में
न ही चौंक कर जागी थी वह
न ही दिल उसका धडका था

रोज़ की तरह सूरज भी ढला था वक्त पर ही
और साँझ घिर आई थी हौले-हौले
दरवाज़े पर दस्तक की आस संजोए
चूल्हे पर चाय की केटली रख
किसी पत्रिका के पन्ने पलटते
देख लेती थी बीच बीच में वह
टिक-टिक करती घडी की सूइयाँ 
रोज़ की ही तरह

कि एक लमहे का पाँव फिसला था
और सो गई थी ज़िन्दगी
वक्त के पहिए तले
गुमसुम ...चुपचाप
और एक दुनिया उजडी थी

(22 दिसम्बर को जीजाजी की याद में )


Monday, December 16, 2013

प्रवासी के कुछ ख़त

प्रवासी के कुछ ख़त

1.        

आज अचानक ही ठंढ बढ गई
घना कोहरा है
गाडी चला रहा है ड्राइवर
सडक के बीच सफेद पट्टी थामे
धीरे-धीरे
एहतियात और एतमाद के साथ
सामने से कोई दूसरी गाडी आ जाए
गर अचानक  
वैसे ही सफेद पट्टी पर
तो दोनों डरते हैं
अपने अपने किनारे पकडने में

2.        

रात कुछ ज्यादा हो गई है
लौट रहा हूँ दौरे से
अभी खाना बनाना भी है बाक़ी
और माँजने हैं सबेरे के बर्तन
ठंढ कुछ बढ गई है
कनकनी सी है हवाओं में
पानी छूने में लगता है डर
हाथ जम न जाए कहीं ...

याद आते हैं वे जाडों की रात
जब तुम किचेन का काम समेट
आती थी बिस्तर में 
और छूती थी
अपने ठंढे हाथों से जिस्म मेरा
मैं कैसा चिहुँकता था
मेरी नाराजगी से सहम जाती थी तुम
आज मैं सोचता हूँ
मैं इन जमे हाथों से
गर छू लूँ सुर्ख़ गाल तेरे
तो क्या करोगी तुम
मुझे पक्का यकीं है कि
थाम लोगी हथेलियाँ मेरी
चूम लोगी खुरदुरे हाथ मेरे
पिघला दोगी हाथों की ठंढक
और भर दोगी गर्मियाँ उनमें  
है न...... 

3.        

जानती हो...
मैं अब खाना बनाना सीख चुका हूँ
पहले की तरह
सिर्फ पावरोटी-चाय या मैगी खाकर
दिन नहीं गुजारता
पूरे सलीके से सब्जियों में छौंक लगाता हूँ
आकर देखो कभी
तेजपत्ते की खुशबू और हींग की दाल खाने के बाद
चूमोगी मेरी ऊँगलियाँ भी तुम  


4.        


तुम भी तो लौटी होगी देर शाम दफ्तर से
थक कर निढाल सोफे पर गिरी होगी
चाय बनाने की भी हिम्मत नहीं होगी
सैन्डिल फेंकी होगी इधर उधर
और पर्स पडा होगा कालीन पर
यूँ ही घंटे भर पडे रहने के बाद
उठी होगी और कुछ भी डाल लिया होगा पेट में बासी
सोने के पहले 

बस यही सोच कर तुम्हारे लिए भी
मैं डाल देता हूँ एक मुट्ठी
चावल कुकर में
जानती हो...
फिर सबेरे छत पर
ख़ूब शोर मचाते हैं परिन्दें


5.        

शाम ढलते ही
जब परिन्दे अपने घोंसले की ओर उडते हैं
रहता हूँ उस वक्त मैं अपने ऑफिस में  
सर घुसाए फाइलों में
और देर तलक बैठा रहता हूँ
जबतक जेनरेटर की घडघड सुनाई देती है
डरता हूँ घर आने में
घुप्प अँधेरे में सीढियों पर चढते
कई बार टकराया हूँ दीवारों से
और करनी पडती है ताला खोलने में भी मशक्कत  

एक मुद्दत हो गई टी.वी. देखे
कहो, कौन सा सीरियल आजकल देख रही हो तुम
अब तो आसां हो गई होंगी तुम्हारी रातें
जब आता होगा तुम्हारे पसन्दीदा सीरियल का समय
या मिस करती हो न्यूज चैनल की ज़िद्द मेरी  

6.              

बहुत कुछ बदल गया
अकेले रहने में
अब बाल या नाख़ून बढते हैं
तो महीनों बढे रहते हैं
कोई कुछ भी नहीं कहता
‘शेव’ भी रोज़ नहीं करता
और कपडे भी कहाँ धुल पाते हैं रोज़ाना

समझने लगा हूँ
क्यों तुम चीजों को
इतना परख कर लेती थी दूकानों से
‘विम’ अच्छा या ‘एक्सपर्ट’ बेहतर
हथेलियाँ खुरदरी नहीं होंगी किस साबुन से
कौन सी चीज ‘इकॉनॉमिक’ पैक में
किन चीजों पर कितनी छूट   
अब मैं भी जान गया हूँ
चीजों के दाम
और पता चल गया है
आटे-दाल के भाव

मेरे बग़ैर तुम कितना बदली
लिखना जरूर
अगली ख़त में

14.12.2013 
7.  

कल रात उतर आया था
चाँद मेरे कमरे में
रोशनदान से
सोते वक्त जब करवट बदली
तो चौंक पडा था मैं
नीचे, टाइल्स बीछी फर्श पर
अर्श से उतर कर बैठा था चाँद
छोटी जगह है यह
शहरी आबो-हवा से दूर
यहाँ पहचानते हैं लोग मुझे
अदब से पेश आते हैं मुझसे  
अब चाँद-सितारे भी लग गए हैं
ख़ैर-मकदम में मेरे


18.12.2013