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Wednesday, January 1, 2014

ऐसा कुछ भी तो नहीं हुआ

2.      

ऐसा कुछ भी तो नहीं हुआ था जैसा फिल्मों में अक्सर होता है
न ही किसी अस्पताल के मेट्रन ने डॉक्टर से पूछा था
कि वह कब अच्छा हो जाएगा...
न ही कोई डॉक्टर सर झुकाए ओ.टी. से बाहर निकला था
और न ही किसी डॉक्टर के चेहरे पर चिंता की रेखा उभरी थी

बस एक शाम एक डॉक्टर आया था 
और निकाल दी थी उसने
नसों में चढते पानी की सूई
कि चलते फिरते लहू में ही
चढते पानी की रवानी है  
क्यों यह पानी ज़ाया हो
जब रगों में दौडते-फिरते लहू ने 
बन्द कर दिया हो चलना
और उखड गई हों साँसें उसकी

 (बाबूजी की मृत्यु पर)

Friday, January 20, 2012

विश्राम


एम्बुलेंस में रखा बाबूजी का निष्प्राण शरीर
उनकी लुढकी आँखों के साथ
बैठी माँ
और हम दोनों भाई
दुर्गम घाटी के सुनसान रास्तों पर
सरपट दौडती
सन्नाटे और अँधियारे की छाती को चीरती
एम्बुलेंस की नीली बत्ती
माहौल भयानक पर हम सब भयरहित,
सर्वस्व छिन जाने के बाद
अब कैसा भय?
गड्ढों में एम्बुलेंस के उछलने पर
शरीर के इधर-उधर लुढकने पर
बरबस उनके आराम की चिंता
और फिर एक मायूस हँसी...
चिर निद्रा में आराम ही आराम
और जीवन का पूर्ण विश्राम...



Tuesday, September 13, 2011

बाबूजी और मैं


जब भी सुनता हूँ कि
औलाद को पिता से आगे निकलना चाहिए
दिल पर एक आरी सी चलती है


लोग कहते हैं कि मैं अपने पिता से आगे चल रहा हूँ

वे  पैदल चलते थे,
मेरे पास कार
उनकी आवश्यकताएँ सीमित,
मेरी चाहतें बेशुमार
उनके पास दो जोडी धोती
तो मेरी वार्ड-रोब भरी होती
उनके पास एक जोडी चप्पल और एक जोडे जूते
मेरे पास न जाने कितने होते


लोग कहते कि मैँ अपने पिता से आगे चल रहा हूँ

उनकी तनख्वाह दो हजार
मेरे शेयर मेँ ‘इंवेस्ट’
उनकी जमापूँजी हम दो भाई
मेरे कई ‘एसेट्स’
वे शनिवार हनुमान मंदिर जाते
मैँ पिक्चर या क्लब
वे चिंतन मनन करते
मैँ दोस्तों से गप-शप

लोग कहते कि मैँ अपने पिता से आगे चल रहा हूँ

उनकी तनख्वाह कम, निर्भर दस
फिर भी रहते सब संतुष्ट
मेरी तनख्वाह अधिक, निर्भर दो
फिर भी हैं सब रुष्ट