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Sunday, April 3, 2016

आसमान की चादर


सोचता हूँ,
बेख़बर नींद में

गर आसमान की चादर तन से हट जाए तो ...!!

Monday, March 21, 2016

सूक्ति


कभी कभी जाने अनजाने हम ऐसा कुछ कह जाते हैं
दिल पर गहरा बोझ लिए फिर जीवन भर पछताते हैं

बत्तीस दाँतों के पहरे में भी जीभ फिसल ही जाती है 
धनुष से छूटे बाण कहाँ,  फिर वापस आ पाते हैं

कोई गलती एक बार हुई हो तो यह बात अलग है
ठोकर खा कर भी हम क्यूँ उस गलती को दोहराते हैं

हर ज़ख़्मों में सबसे गहरा ज़ख़्म है कड़वी बातों का
लाख लगाओ मरहम फिर भी दाग़ कहाँ धुल पाते हैं


Sunday, December 6, 2015

क्षमा

कभी कभी मैं सोचता हूँ
गर क्षमा नहीं होती
तो क्या होता

कितना बोझ होता सीने पर
गाँठें नहीं खुली होतीं
ज़ेहन से टीस उठती बारहा
और दिल भरा भरा होता

ज़ुबां में रस नहीं होता
नाउम्मीदी घिरी होती
घृणा के बोझ से दबा होता
और मन घुटा घुटा रहता

धुआँ उठता हमेशा यादों का
चिनगारी दबी होती
इक ज़रा हवा पाकर
हर घर जला हुआ होता

सुख-चैन, अमन नहीं होता
उन्मुक्त कहाँ गगन होता
उजड़ा हुआ चमन होता 
बेरुख़ी का चलन होता 

पाँव में बँधा वज़न होता
दुखों से मैं घिरा होता 
औरों की क्या कहूँ ख़ुद की
नज़र से मैं गिरा होता



Sunday, November 8, 2015

आख़िरी रात



आज की रात आख़िरी है मधुबनी में मेरी यह रात
फिर न होगी वह रातों को छत पर टहलने की बात

वो चाँद का छत की रेलिंग पकड कर बारहा टँगना
कभी टंकी के पीछे औंधे मुँह फिसल कर गिरा पाना
उतर आना मेरे कमरे में रोशनदान से अक्सर
टाइल्स की फर्श पर बैठ टकटकी बाँध कर तकना
वो हमसफर बन ट्रेन के फिर साथ ही चलना
मेरे सुख-दुख का साथी बन हमेशा राजदां रहना

सबेरे  ट्रेन की आवाज़ सुन कर मेरा जगना
इक ख़याल कि कोई आएगा दिल में कहीं बसना
दरवाज़े पर हर आहट से फिर चौंक कर उठना
मायूस हो जाना, चाँद की राह फिर तकना

कितना तन्हा गुज़रेगी कल से उस घर के छत की रात
बहुत रोएगा मेरे बग़ैर वो मधुबनी का चाँद ...!! 


Wednesday, September 9, 2015

वर्तमान की खोज





मैं वर्तमान में जीना चाहता हूँ
प्रतिक्षण बीतते लमहों
के बीच

इस वर्तमान को ढूँढा है मैंने कई जगहों पर
बहती नदी में
पर हर प्रवाह बीतती दिखी है मुझे
मैं दो प्रवाहों के बीच उसे पकड़ना चाहता हूँ

चढ़ते सूरज में
पर चढ़ते सूरज के साथ मिली है बढ़ती गर्मी मुझे
मैं प्रतिक्षण बढ़ते तापों के बीच ठहरना चाहता हूँ

बादलों में
पर बदलता मिला है रंग बादलों का प्रतिपल
मैं बदलते रंगों के बीच का रंग छूना चाहता हूँ

झरनों के गिरते पानी में
पर शोर मचाते बहते पानी में कोलाहल मिला है मुझे
मैं गिरते पानी की खामोशी महसूस करना चाहता हूँ

हवाओं में, फूलों की खुशबू में
पर हवाओं की अलग-अलग गंध मिली है मुझे
मैं हवाओं में खुशबूओं के घुलने का पल देखना चाहता हूँ

लेखों में, शब्दों और हर्फों में भी ढूँढा है उसे
पर ‘पल’ शब्द के दोनों अक्षरों के बीच एक लम्बी दूरी मिली मुझे
इस दूरी को मैं पाटना चाहता हूँ

अक्षरों के बीच की दूरी का अहसास डाल देता है मुझे
भूत और भविष्य की उलझन में
पल के ‘प’ के आने के बाद जुड़ना ‘ल’ का
बना देना ‘प’ को बीता हुआ और ‘ल’ को आने वाला
‘प’ भूत, ‘ल’ भविष्यत
मैं इन दो अक्षरों के बीच की जगह में जीना चाहता हूँ

मैंने ‘पल’ की तरह ‘तुम’ में भी ढूँढा है उसे
पर तुम का ‘तू’ बीता हुआ मिला मुझे
मैं ‘तुम और मैं’ के बीच में साँस लेना चाहता हूँ
जहाँ ना तुम ‘तुम’ रहो
ना मैं ‘मैं’

मुझे वर्तमान का पता दे दो
कि जी सकूँ उसके साथ
मुक्त
नि:शब्द
निर्द्वंद्व...!!


Tuesday, July 14, 2015

जीवन भूलने का एक लम्बा सिलसिला है.....

1..

बाहर जितना फैला आकाश
उतना ही
भीतर भी है मेरे आकाश

एक कम्प्यूटर की तरह
खुलते हैं कई ‘विंडोज’
अन्दर ही अन्दर मेरे मन में 
हर ‘विंडो’ के भीतर 
फैला होता है एक विस्तृत आकाश   
सूना-सूना,
तन्हा-तन्हा
परत दर परत जब खुलती हैं खिडकियाँ 
दिल की गहराईयों में
तो मिलता है हर ‘फोल्डर’
‘एम्प्टी’ ही... 

उन ‘फोल्डरों’ में कभी डाल रखे थे मैंने
किस्से और कहानियाँ,
दर्द के कुछ दास्तान
ज़ख़्मों के कुछ बासी निशान 
वक्त के साथ बडे ही एहतियात के साथ
‘डिलिट’ करता गया था
यादों के उन ‘जंक’ जमावडों को
कोई दूसरा विकल्प भी तो नहीं था   
भूलने के सिवा..!!

2..

बाहर के आकाश में चमकते हैं 
चाँद और सूरज
चमकते हैं कई तारे
साथ निभाते हैं उसका
बादल और हवाएँ भी

कम्प्यूटर के नभ-डेस्कटॉप पर भी
चमकते हैं चाँद और सूरज के ‘आइकॉन्स’
जो ढँकते रहते हैं
अनगिनत तारों के छोटे-मोटे फाइल्स या फोल्डर्स     
अंतरनेत्र (इंटरनेट) में झाँक कर देखो
खुलेंगे हज़ारों ‘विंडो’,
एक मेला सा लगा रहता है हर ‘विंडो’ के अन्दर
रौनक़ें रहती हैं उस मेले में   

पर मेरे भीतर के आकाश में
तम का घर है
'फॉरमेटिंग' की जरूरत है उसे 
फिर कोई 'एंटी-वायरस' भी लोड करना होगा
रौशन करने के लिए
यह आकाश....!!

3..

हर शाम
चराग जलते ही
अपने बुझे हुए चाँद और सूरज लिए
मन के 'डेस्कटॉप' पर
रह-रह कर उभर आते हैं                      
अंतर्मन से कुछ पुराने ‘पोस्ट्स’            
आदतन मैं भी ‘रिस्टोर’ किए देता हूँ
’रिसाइकल बिन’ से वे ‘पुराने फाइल्स’         
संस्कारी हूँ, घर आए अतिथि को
यूँ ही वापस नहीं लौटा सकता
पाँव फैला कर बैठ जाते हैं
मेरे आँगन में फिर ये मेहमाँ
खातिर-तवज्जो के बावजूद जल्दी नहीं उठते
और मैं सोचता रहता हूँ
जीवन क्या है?

जीवन भूल जाने और फिर याद करने का
एक लम्बा सिलसिला 
ही तो है....



Sunday, June 14, 2015

ख़्वाब

1.

कल रात देखा इक ख़्वाब
कि जनाज़ा उठ रहा है मेरा
बदहवास से थे चेहरे कई
और सूजी हुई थी आँखें सबकी
आँचल से ढके चेहरे में
सुबकता हुआ खो गया भीड में कोई

आँख खुली तो देखा
चाय की प्याली लिए खडी थी सामने सुधा
बोली,
देर से निहार रही थी तुमको
क्या देख रहे थे कोई मीठा सपना?

2.

ख़्वाब देखते हुए तुम अच्छे दिखते हो
और सच्चे भी
इसलिए जगाया नहीं तुमको
मैं क्या कहता?
एक तो घबराया हुआ था
ख़्याले-मौत से अपनी
और दूसरी तरफ इक सुकून भी था ज़ेहनो-दिल में
कोई तो है?
भूला नहीं जो मुझको मेरे मरने के बाद भी
बस इतना ही कहा,
नहीं कोई ख़्वाब नहीं..

3.

बोली वह,
झूठ बोलते तुम पकडे जाते हो
मैंने साफ देखा था
ढूँढ रही थी
तुम्हारी अधखुली आँखें 
शायद किसी को
भूल चुका है जो तुम्हें
चलते चलते मुख़्तलिफ राहों पे अपने
बेमानी है ठंढे रिश्तों की तलाश  
जिस तरह अब यह चाय
ठंढी हो चुकी है....!!



Saturday, March 21, 2015

ब्लॉटिंग पेपर


ग़मों की स्याही उडल जाती है
किसी दावात से हर दिन
डुबो-डुबो के लिखता हूँ कंडे की इक कलम से
हर रोज़ एक हर्फ़
अपनी ज़िन्दगी के कोरे काग़ज़ पर

सोचता हूँ बनेगा एक दिन
तिनका तिनका जुड कर उन हर्फ़ों से कोई गीत 
हर्फ़ जो बिखरे रहते हैं दिल के पन्नों पर
माएने की तलाश में

पर मुकम्मल होने के पहले ही
सोख लेता है स्याही 
मेरे दिल का ब्लॉटिंग पेपर

ये ग़मों की भीड कुछ दिन टिक जाती
तो पूरा हो जाता
मेरा कोई गीत
बेवज़ह वरक़ भी दिल की किताब का
उडता नहीं फज़ाओं में
बिखरे हर्फ़ लिए…!!     



Monday, January 19, 2015

मेरी रूह मेरी साँसें मेरी जान मेरा दम


मेरी रूह, मेरी साँसें,
मेरी जान, मेरा दम
एक हैं या मुख़्तलिफ,
यह सोचते हैं हम

क़ैद है इक घर में जाँ
जहाँ घुटता उसका दम
साँसों का इक हिसाब है
जो होता हर पल कम

जबतक घर में जाँ है,
रूह आदमी के साथ है
घर के बाहर आते ही
फिर खाली उसका हाथ है

जाँ के निकलते ही
फिर मौत का है गम
दम से ही जीवन का
लहराता है परचम

जान, दम और साँस से
ज़िन्दगी की आस है
ये नहीं तो रूह को
ख़ुदा की रहती तलाश है


लिबास

2.

इक लिबास पहनता हूँ मैं हाकिम का
डाँटता फटकारता हूँ अपने मातहत को
रूह को होती है जिससे तकलीफ

इक लिबास मातहत का भी होता है
जो हुक्म बजाता है अपने हाकिम का
हाथ बाँधे खडा होता है उनके सामने
जो खोलता है अपनी ज़ुबान बडे एहतियात के साथ
ऐसा करने में रुह का घुटता है दम

ओढे रहता हूँ फिर एक ऐसा लिबास
जिससे लोगों को भरम होता है
मेरी खुशमिजाजी का
सामना करता हूँ दिन भर 
सच के अनगिनत छींटे
पोंछता रहता हूँ जिसे
झूठ के रुमाल से

शाम को थका-हारा घर आने पर
उतार डालता हूँ दिन भर के पहने वे सारे लिबास
टाँग देता हूँ उन्हें उसी वार्डरोब में
या खूँटियों पर
कुछ यूँ ही रख देता हूँ पलंग के पाएताने भी
दूसरे दिन पहनने के लिए

बहुत शिद्दत से फिर ढूँढता हूँ इक ऐसा लिबास
जिसमें मैं मैं होता हूँ
दिखता तो है ऐसा लिबास
पर मुझे फिट नहीं हो पाता
दर्जी ने काफी टाइट सिला है इस लिबास को..

उदास सो जाता हूँ मुँह ढक कर
ओढ कर वही पुराना लिबास
तनहाई का 
याद आता है जिसमें
बचपन का वो लिबास
जो कई सालों तक माँ ने
संजो कर रक्खे थे इक सन्दूक में
जिसे कुछ ही साल पहले
बेचकर खरीदे गए थे कुछ बरतन
जो टकराते रहते हैं एक दूसरे से
बेवजह
बारहा....!!





Saturday, January 10, 2015

लिबास


रोज़ ऑफिस जाते वक्त जब वार्ड रोब खोलता हूँ
देखता हूँ
हैंगर में टँगे कपड़े
यूँ लगते हैं जैसे कोई देह 
अपना लिबास छोड़ निकल गई हो
या देह से रूह...
कोट यूँ दीखते हैं जैसे
निकल गया हो उसमें से सर अपनी गर्दन के साथ
और पैंट से ज्यूँ पैर कहीं

यूँ ही कुछ देर सर कटे कोट
और बिन पाँव की पैंट देखता हूँ
और फिर ख़ुद को... 
जो कहने के लिए वार्ड रोब के सामने नंगा खडा है
पर है वह भी इक लिबास में
अपनी रूह के लिए देह का लिबास पहने

बिन रूह की देह अच्छी नहीं दिखती
मैं झटपट कोट को अपनी गर्दन और
पैंट को पैर पहना कर
उस लिबास को एक रूह दे देता हूँ..   

इक लिबास के ऊपर दूसरा लिबास पहने
मैं ऑफिस चला जाता हूँ जहाँ
और न जाने कितने लिबास पहनने होते हैं मुझे...!!



Monday, January 27, 2014

कुछ कम्प्यूटरी कविताएँ


1.

चलो न एक ‘आईडी बनाएँ
अपना नाम छिपाएँ
भेजें एक दूसरे को ‘फ्रेंड रिक्वेस्ट’
’फेसबुक’ पर
फिर खूब करें हम
प्रेम की बातें

तुम्हारे दिल में भी तो दबी होंगी
सदियों पुरानी छटपटाहट
कि कोई तो हो
रख दें जिसके सामने अपना दिल खोलकर
आओ तोड दें हम
वर्जनाओं की ज़जीरें
एक ‘क्लिक’ के साथ
और देखें एक दूसरे का ‘टाइमलाइन’
के इतने दिनों में कितना बदल चुके हम
अभी भी वैसे ही ‘ग्लो’ करती हो तुम
या सिलवटें पडने लगी हैं चेहरे पर
तुम्हें भी तो ख़्वाहिशें होंगी जानने की कुछ
वक्त के थपेडों में वक्त के पहले ही
सफेदी आ चुकी कब की बालों में
नज़दीक का चश्मा भी चढ गया है आँखों पर
हमें कहाँ कभी भी किसी ने सुना,
पहले बाप-दादा, अब बच्चों की सुन रहे हम
आओ सुनाएँ एक-दूसरे को दिल की बातें 
पूरा करें साथ दरिया के किनारे बैठकर
'सनसेट' देखने का तसव्वुर
‘मज़ा आता अगर बीती हुई बातों का अफसाना
कहीं से तुम  बयाँ करते, कहीं से हम बयाँ करते’
आओ न ...
एक आई डी बनाएँ...!!

2.
क्यों चौंक रही हो तुम,
मेरे फेसबुक में नौ सौ बत्तीस ‘फ्रेंड्स’ देखकर
इनमें चार सौ पचपन लडकियाँ हैं इसलिए?
अरे नहीं... ये सब तो यूँ ही मुझसे जुडी हैं
जैसे औरों से भी जुडी होंगी
ये सब झूठे हैं
शायद नाम भी झूठे हों
और तस्वीर भी किसी और की लगा ली हो शायद...

मैं भी कहाँ सच्चा हूँ
क्या नहीं हो सकता है कम्प्यूटर में ?
तुम भी जुड जाओ न मुझसे ‘करीना’ बनकर
मैं भी ‘सैफ’ की तस्वीर ‘कॉपी’ और ‘पेस्ट’ कर दूँगा
अपनी जगह
फिर तलाशेंगे एक दूसरे में सच्चे दोस्त की तस्वीर
रोज़ाना
देर रात तक ‘इंटरनेट’ खोल कर

3.
कितना अच्छा लगेगा जब
मेरी डाली हुई ‘सनसेट’ या चिडिया या किसी फूल की तस्वीर को
‘लाइक’ करोगी तुम
या किसी लिखी हुई किसी साधारण सी बात पर भी
'कमेंट’ में लिखोगी ‘सुपर्ब’ या ‘2गुड’
कहाँ कोई किसी की तारीफ करता है मुँह पर
और पीठ पीछे तो रवायत ही है शिकायत की 
भला हो ‘ज़ुकरबर्ग’ का
जो है सामने है
पता है?
अब मौत की ख़बरें देने पर भी
आने लगे हैं मित्रों के ‘लाइक’
अम्मा की मौत की ख़बर डाली थी ‘फेसबुक’ में
कुल बत्तीस ‘लाइक’ आए थे
कहाँ मिलते हैं अब काँधे अर्थी उठाने वास्ते
या सर रख कर रोने के लिए
‘लाइक’ और ‘कमेंट की संख्या गिन
ख़ुश हो लेना ही काफी है
कि शरीक हैं इतने लोग
मातमपुर्सी में....!!