Showing posts with label personal. Show all posts
Showing posts with label personal. Show all posts

Friday, March 25, 2016

रिश्ता मेरा


रिश्ता मेरा नाज़ुक धागा
इन धागों में पड़ी हैं गाँठें
ये धागे अब टूटे सो तब टूटे

रिश्ता मेरा कच्ची टहनी
रख कर पाँव चढ़ूँ जो ऊपर  
ये टहनी अब टूटे सो तब टूटे 

रिश्ता मेरा छोटी नैया
यह नैया मँझधार में डोले
ये नैया अब डूबे सो तब डूबे  

रिश्ता मेरा नट की रस्सी
इस रस्सी पर खेल दिखाते
पाँव मेरे अब फिसले सो तब फिसले

रिश्ता मेरा चाकू की धार
चाकू से भी तेज़ जुबाँ है 
सर मेरा अब रेते सो तब रेते 

रिश्ता मेरा आश्विन की धूप
इस गर्मी में नहीं है पानी
चमड़ी मेरी अब सूखे सो तब सूखे

रिश्ता मेरा काग़ज़ का पुर्ज़ा  
इस पुर्ज़े पर प्यार की बातें 
बूँद पड़े अब घुले सो तब घुले 

रिश्ता मेरा आदमकद शीशा  
पत्थर बीच रखा यह शीशा  
यह शीशा अब चनके सो तब चनके

रिश्ता मेरा जैसे पिंजड़ा 
इस पिंजड़े में फड़फड़ पंछी
यह पंछी अब उड़े सो तब उड़े    

(होली/24.03.2016)

Monday, December 16, 2013

प्रवासी के कुछ ख़त

प्रवासी के कुछ ख़त

1.        

आज अचानक ही ठंढ बढ गई
घना कोहरा है
गाडी चला रहा है ड्राइवर
सडक के बीच सफेद पट्टी थामे
धीरे-धीरे
एहतियात और एतमाद के साथ
सामने से कोई दूसरी गाडी आ जाए
गर अचानक  
वैसे ही सफेद पट्टी पर
तो दोनों डरते हैं
अपने अपने किनारे पकडने में

2.        

रात कुछ ज्यादा हो गई है
लौट रहा हूँ दौरे से
अभी खाना बनाना भी है बाक़ी
और माँजने हैं सबेरे के बर्तन
ठंढ कुछ बढ गई है
कनकनी सी है हवाओं में
पानी छूने में लगता है डर
हाथ जम न जाए कहीं ...

याद आते हैं वे जाडों की रात
जब तुम किचेन का काम समेट
आती थी बिस्तर में 
और छूती थी
अपने ठंढे हाथों से जिस्म मेरा
मैं कैसा चिहुँकता था
मेरी नाराजगी से सहम जाती थी तुम
आज मैं सोचता हूँ
मैं इन जमे हाथों से
गर छू लूँ सुर्ख़ गाल तेरे
तो क्या करोगी तुम
मुझे पक्का यकीं है कि
थाम लोगी हथेलियाँ मेरी
चूम लोगी खुरदुरे हाथ मेरे
पिघला दोगी हाथों की ठंढक
और भर दोगी गर्मियाँ उनमें  
है न...... 

3.        

जानती हो...
मैं अब खाना बनाना सीख चुका हूँ
पहले की तरह
सिर्फ पावरोटी-चाय या मैगी खाकर
दिन नहीं गुजारता
पूरे सलीके से सब्जियों में छौंक लगाता हूँ
आकर देखो कभी
तेजपत्ते की खुशबू और हींग की दाल खाने के बाद
चूमोगी मेरी ऊँगलियाँ भी तुम  


4.        


तुम भी तो लौटी होगी देर शाम दफ्तर से
थक कर निढाल सोफे पर गिरी होगी
चाय बनाने की भी हिम्मत नहीं होगी
सैन्डिल फेंकी होगी इधर उधर
और पर्स पडा होगा कालीन पर
यूँ ही घंटे भर पडे रहने के बाद
उठी होगी और कुछ भी डाल लिया होगा पेट में बासी
सोने के पहले 

बस यही सोच कर तुम्हारे लिए भी
मैं डाल देता हूँ एक मुट्ठी
चावल कुकर में
जानती हो...
फिर सबेरे छत पर
ख़ूब शोर मचाते हैं परिन्दें


5.        

शाम ढलते ही
जब परिन्दे अपने घोंसले की ओर उडते हैं
रहता हूँ उस वक्त मैं अपने ऑफिस में  
सर घुसाए फाइलों में
और देर तलक बैठा रहता हूँ
जबतक जेनरेटर की घडघड सुनाई देती है
डरता हूँ घर आने में
घुप्प अँधेरे में सीढियों पर चढते
कई बार टकराया हूँ दीवारों से
और करनी पडती है ताला खोलने में भी मशक्कत  

एक मुद्दत हो गई टी.वी. देखे
कहो, कौन सा सीरियल आजकल देख रही हो तुम
अब तो आसां हो गई होंगी तुम्हारी रातें
जब आता होगा तुम्हारे पसन्दीदा सीरियल का समय
या मिस करती हो न्यूज चैनल की ज़िद्द मेरी  

6.              

बहुत कुछ बदल गया
अकेले रहने में
अब बाल या नाख़ून बढते हैं
तो महीनों बढे रहते हैं
कोई कुछ भी नहीं कहता
‘शेव’ भी रोज़ नहीं करता
और कपडे भी कहाँ धुल पाते हैं रोज़ाना

समझने लगा हूँ
क्यों तुम चीजों को
इतना परख कर लेती थी दूकानों से
‘विम’ अच्छा या ‘एक्सपर्ट’ बेहतर
हथेलियाँ खुरदरी नहीं होंगी किस साबुन से
कौन सी चीज ‘इकॉनॉमिक’ पैक में
किन चीजों पर कितनी छूट   
अब मैं भी जान गया हूँ
चीजों के दाम
और पता चल गया है
आटे-दाल के भाव

मेरे बग़ैर तुम कितना बदली
लिखना जरूर
अगली ख़त में

14.12.2013 
7.  

कल रात उतर आया था
चाँद मेरे कमरे में
रोशनदान से
सोते वक्त जब करवट बदली
तो चौंक पडा था मैं
नीचे, टाइल्स बीछी फर्श पर
अर्श से उतर कर बैठा था चाँद
छोटी जगह है यह
शहरी आबो-हवा से दूर
यहाँ पहचानते हैं लोग मुझे
अदब से पेश आते हैं मुझसे  
अब चाँद-सितारे भी लग गए हैं
ख़ैर-मकदम में मेरे


18.12.2013  

Sunday, August 11, 2013

पचपनवें जन्मदिन पर

आज मैं हुआ पचपन का
याद आ रहा एक वाक़या बचपन का
बारह का हुआ तो नानी अक्सर कहती थी
‘‘बारह बरस का पुत्ता, भए तो भए नहीं तो गए”

तेरह से उन्नीस तक ‘टीन’ था
सो टीन की तरह बजता रहा...
बीसेक साल की उम्र में काम मिला  
तो नानी बहुत खुश हुई थी
’पुत्ता बन गया’
और मैं.....
साँप-छ्छून्दर की तरह
काम न निगलते बना न उगलते
आज तक फँसा हुआ हूँ

मन ने चाहा कोई गीत रचूँ
कुछ गुनगुनाऊँ,
दिल ने कहा कुछ रंग भरूँ
कोई चित्र बनाऊँ
बुद्धि ने कहा लेख लिखूँ
कोई ग्रंथ गढूँ 
तभी काम ने कहा
हवाओं में उडने की तुम्हें इजाजत नहीं
नौकरी की पुस्तिका में
गीत रचने 
चित्र बनाने या
ग्रन्थ लिखने के निर्देश नहीं
हमें चाहिए तुमसे
लाभ और वृद्धि
इसलिए काबू में रखो
अपना मन और बुद्धि 
ये सब करने थे तो काम में न आते
और 'पुत्ता गए' कहलाते

आज मैं अपनी टूटी हुई आवाज
सादा कैनवास और
कोरे कागज को देखते हुए
सोचता हूँ
कितना अच्छा होता मैं
बारह बरस पर ही रूका रहता. 


Saturday, August 11, 2012

जन्मदिन पर


ज़िन्दगी की जमापूँजी में से
जैसे पचास बरस खर्च हुए
वैसे खिसक गए
दो चार और साल
और खडा रहा मैं
जहाँ के तहाँ
हासिल हुए सिर्फ कुछ सफेद बाल

ये ज़िन्दगी भी बडी अजीब शै है
आप चलें,
दौडें या रूके रहें
बीत जाती है यह
पर कर जाती है एक सवाल
और माँगती है जवाब....

मुझे याद नहीं कि
ये चार बरस मैंने खर्च किए
या चोरी चले गए
या राह चलते कहीं यूँ ही गिर गए
या किसी ने मुझसे छीन लिए ....

मैंने रक्खे नहीं हैं कोई हिसाब
इसलिए कैसे दूँ उसे जवाब...


Wednesday, May 23, 2012

अज़ीज़ साहब की शान में


भुलाए न भूलेगा मुझे वो दिन
देखना इंडिया हैबिटैट सेंटर में
एक मुसव्विर का शाहकार
चित्र जैसे बोलते हों
और हो जाते हों साकार
कैनवास पर उकेरे अज़ीज के घोडे
इतने जीवंत कि मेरे मन को भी ले उडे
कहीं बनारस के घाट तो कहीं गोलकुंडा के किले
कभी अजंता की गुफा में या महाबलीपुरम चले
ताल-तलैयों में ‘लिली’ के फूल या सुंदर कंवल
जैसे छिटकी चाँदनी में आसमां गाता ग़ज़ल

हर कृति अलफाज़ से परे थी
क्या ख़ूब रंगों की छटा थी
बादलों की ओट में छिपता चाँद
या फिर कहीं काली घटा थी
अब यही दिल में उठ रही हैं ख्वाहिशें
अल्लाह करे उन पर हों बरकतों की बारिशें !!
23.2.2011
(अज़ीज़ साहब विश्वविख्यात चित्रकार हैं जिनसे मिलने का सौभाग्य मुझे दिल्ली प्रवास के दौरान हुआ था)

तुम्हारे लिए, सुधा


ज़िन्दगी के सफर में
हम इतनी दूर तक आ पहुँचे
कई लमहे, खट्टी-मीठी यादें
भागते पेड और बिजली के खम्भों
की तरह पीछे छूट गए
पर कुछ यादें उन सितारों की तरह
जहाँ भी जाउँ साथ ही चलते हैं
और मुझसे कहते हैं
कि अब यह सफर
तन्हा नहीं कटता

ढूँढा करता है दिल मेरा
हर छोटी-मोटी चीजों के लिए तुम्हें
टूथ-ब्रश में पेस्ट लगाने से लेकर
नहाने जाते वक्त तौलिए और कपडे देने
और फिर ऑफिस जाते वक्त लंच देने से लेकर
रात सोने के पहले बिस्तर में मसहरी लगाने तक...
मेरे ख़याल करने की
तुम्हारी इन्हीं आदतों ने
हर वक्त तुम्हें
मेरी निगाह में महफूज़ रखा है

सुबह की चाय
ड्राइंग रूम में सोफे पर
साथ बैठ कर पीने
और ऑफिस से घर वापस आने पर
तुम्हें पास बिठाकर
गुफ्तगू करने की ख़्वाहिशों ने
हमेशा ही तुम्हे मेरे हमराह रखा है

तुम्हारे जन्मदिन पर
यही दुआ है कि
तुम जीती रहो
मेरे सफर के अंतिम पडाव तक
बन कर मेरी हमराह
फिर से हमारा हो साथ
कि कट जाए बाकी दिन
लिए एक दूजे का हाथ !!