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Monday, March 21, 2016

दिसम्बर का महीना


दिसम्बर के महीने में
बच्चों से बातें करने का एक विषय मिल जाता है
ठंढ बढ़ रही है
अपना ख़याल रखना
अलग अलग शहरों का तापमान हर रोज़ गिर रहा है
दिल्ली शीतलहर की चपेट में
लिहाफ में रहना  
वरना पिछले कुछ महीने तक
‘कैसे हो’,
‘क्या हाल है’,
‘खाना खाया’ 
कह कर
और ‘अच्छा हूँ’,
‘काम कर रहा हूँ’,
‘भूख लगेगी तो खा ही लूँगा’
सुन कर ही

फोन रखना पड़ता था...!! 

Sunday, November 22, 2015

गंगासेतु पर ट्राफिक जाम


सरकती मिलेंगी कारें, यह सोचा नहीं था
भयंकर मिलेगा जाम, यह सोचा नहीं था

बडी उम्मीद से निकला था जल्दी घर पहुँचने को
सुबह से हो जाएगी रात, यह सोचा नहीं था

सडक पर भागते फिरते लोगों के किस्से पुराने हैं
यहाँ ठहरी मिलेगी ज़िंदगी, यह सोचा नहीं था

घंटों के सफर के बाद जब हम बीच तक पहुँचे
हुआ उस पार फिर से दूर, यह सोचा नहीं था

उबासी ले ले के जब थक गया मेरा चेहरा
बुझेगी आखिरी किरण उम्मीद की, यह सोचा नहीं था

बचा आधा भी होगा कभी पूरा, जब सोच में आया
दिखेगी उस पार की बस्ती, यह सोचा नहीं था

हमारी दिनभर की जद्दोज़हद से बेखबर हो कर
मकाँ के सब मकीम सोए मिलेंगे, यह सोचा नहीं था

आधी रात को जब मैं थका हारा जो घर पहुँचा
माँ के हाथ का खाना मिलेगा, यह सोचा नहीं था

Wednesday, September 9, 2015

मेरे कुछ दोस्त..



मेरे कुछ दोस्त ऐसे भी हैं जो
फोन इसलिए नहीं उठाते
कहीं मैं कोई काम न बोल दूँ
यह जानते हुए भी कि
मैंने आज तक काम के लिए
कभी भी अपना मुँह नहीं खोला

दरअसल मेरी दोस्ती
मुँह नहीं खोलने के कारण ही टिकी है
जबकि हम दोनों एक ही स्कूल में
एक ही शिक्षक से पढे हैं
‘फ्रेंड इन नीड इज फ्रेंड इंडीड’ 

मैं गर मुँह खोल भी दूँ
और कोई काम बोल भी दूँ
तो उनके लिए यह
खेल है बस ऊँगलियों से बटन दबाने भर का
या किसी हाई-प्रोफाइल पार्टी से चलते वक्त
देर है बस मुँह खोल देने भर की 
पर वे द्वारिकाधीश तो नहीं
कि सुदामा की बातें बिना मुँह खोले ही समझ जाएँ

यह मुँह खोलना भी एक कला है
कब, कहाँ, कैसे और कितना मुँह खोला जाना चाहिए
इसका सलीका होना चाहिए
मैं तो सलीका नहीं होने के कारण मुँह नहीं खोलता
मेरे वे दोस्त शायद यह सोच कर मुँह नहीं खोलते कि
हो सकता है कि सामने वाला उनसे बडा मुँह खोल दे
या उनका मुँह खोलना जाया ना हो जाए
यह भी हो सकता है कि
उन्हें मेरा परिचय दोस्त कह कर देने में
शर्मिंदगी महसूस होती हो

कॉलेज के कुछ ऐसे साथी जिनके साथ
पटना कॉलेज का कभी चक्कर काटा करता था मैं
या दरभंगा हाउस के काली मंदिर की सीढियों पर  
जेपी आंदोलन की सरगर्मियों में
गंगा की लहरें देखते जिनके साथ घंटों गप्पें जमा करती थी
अब यह याद करने के लिए बिल्कुल तैयार नहीं कि
जो मैं याद दिलाना चाहता हूँ वो सच है...

शायद पद हासिल करने के बाद
याददाश्त में कमी आ जाती हो
मुझ जैसा व्यक्ति जिसने
ओहदों की दौड में
अभी तक कोई मील का पत्थर नहीं देखा  
आज भी प्रेमचंद के ‘गिल्ली डंडा’ कहानी के इंजीनियर की तरह
बडी शिद्दत से ढूँढा करता है कोई ऐसा दोस्त
जिसकी उपलब्धि पर बधाई देने पर वह मुझे गले लगा ले
ना कि यह पूछे,
“कोई काम है क्या?”




Sunday, May 24, 2015

‘यूथेनेसिया’

1.

‘यूथेनेसिया’ ‘एक्टिव’ हो या ‘पैसिव’
क्या फर्क़ पडता है
मर तो उसी दिन गई थी मैं
कल तो छोडा है केवल
अपना स्थूल शरीर मैंने ..!!
19.05.2015

Saturday, May 23, 2015

यूथेनेसिया

2.

मर तो उसी दिन गई थी मैं
जब एक बहशी ने तार-तार की थी इज्जत मेरी
और रात भर पडी थी मैं
नग्न, अचेत
अस्पताल के बेसमेंट में

उसके बाद न जाने कितनी बार मरना पडा मुझे
अदालत की चारदीवारी में
बहस-मुबाहिसों में
जुलूस-हडतालों में  
टीवी. और अख़बारों की सुर्ख़ियों में
क्या यह सोच मौत से कम है कि
मैंने काटी उम्र  क़ैद
और उस दरिन्दे ने महज सात साल....!!  

(अरुणा शानबाग की मृत्यु पर मेरी श्रद्धांजलि)

अरुणा शानबाग की आत्मकथा


मर तो उसी दिन गई थी मैं
जब दो ही महीने बाद दुल्हन बनने के सपने
चूर चूर बिखरे पडे थे
अस्पताल के बेसमेंट में
सबेरे उन सपनों की किरचें किसी के पॉव तले लगे थे
और मैं आसीयू में लाई गई थी

ठीक से कह नहीं सकती
लोगों से कहते सुना था
‘रेप’ हुआ था मेरा बीती रात                      
ना..ना... मुँह पर हाथ मत रखो मेरे
कह लेने दो मुझे के दिल से बोझ हटे
सच तो यह है कि
कहना, सुनना या देखना
यहाँ तक कि सोचना भी
कहाँ था बस में मेरे
उस दरिन्दे ने इस कदर चेन से बाँधा था गर्दन मेरी  
कि दिमाग की कई नसों ने
दम तोड दिया था एक साथ ही
फिर कैसे मैं देखती, सुनती, शोर मचाती
या कुछ महसूस करती  
पडी रही लोथ सी
रात भर
सुनसान, अँधेरे बेसमेंट में
और देखता रहा तमाशा
मेरे अन्दर का द्रष्टा
मुझसे ही बाहर निकल
पूरे बयालीस साल....   

याद आता है....
नहीं, मुझे तो कुछ भी याद नहीं
यह तो द्रष्टा का कहना है कि
निकला था एक सिलसिला
मेरे मरने का हर पल हर छिन
उसके बाद 

सबसे पहली मौत इस सोच से आई
कि धोखा है नामों में 
युगों का फर्क़ है शायद  
एक डाकू था त्रेता युग का
जिसने पनाह दी थी सीता को वाल्मीकि बन   
एक नाम का वाल्मीकि यह था
कलयुग का
जिसने लूटा मुझको डाकू बन

एक मौत आई थी जब
कान के बूँदे लूटने का आरोप
लगाया गया था उस दरिन्दे पर और
छिपाया गया था वाक़्या ‘रेप’ का
जैसे सोने के गहने      
मेरी अस्मिता के लिए ज्यादा महत्त्वपूर्ण हों 

एक मौत उस वक्त भी आई थी  
जब मेरे सपनों के राजकुमार ने
जो आता था मुझे देखने हर रोज़
बन्द कर दिया था आना मुझसे मिलने अचानक ही
शायद पता चल गया था उसे
मेरी बेहोशी के बारे में  
कि कॉमा नहीं,
फुलस्टॉप हूँ मैं  


 19.05.2015



Monday, February 16, 2015

ताछोड़ो....

‘ताचड़ो’ बोलता था वह
और हम समझते थे ‘ताछोड़ो’
न वह सही बोलता था
न हम ठीक समझ पाते थे

घर के बगल वाली ज़मीन पर ही था वह ताड़ का पेड़
जिसपर कहीं से कटी हुई पतंगे आकर फँसती थीं
हज़ार कोशिशें होती थीं उसे उतारने के लिए
तब हमें इंतज़ार होता था उस पासी का
जो पाँव में रस्सी फँसा, कमर में हँसिया, पीछे हँडिया लटकाए
चढ़ जाता था उस ऊँचे ताड़ पर तेजी से

खेल था उसके बाएँ हाथ का 
इतने ऊँचे पेड़ पर चढ़ना

चढ़ने के पहले
एक कर्कश आवाज फूटती थी उसके गले से
“ताचड़ो.....” यानी “ताड़ चढ़ो”  
बिना टेर लगाए भी चढ़ सकता था वह ताड़ पर
पर एक तहजीब निभाता था वह
अगल बगल के मकानों में उस ऊँचाई से
ताक झाँक करने का आरोप लग न जाए कहीं
आगाह कर देता था अपनी टेर से

उसकी गगनभेदी आवाज़ सुन हम दौड़ आते थे
उससे हफ्ते पहले की फँसी हुई पतंग उतारने के लिए कहते थे
वह ऊपर पहुँच कर
हँसिया से न जाने क्या-क्या काटता-छीलता था
फिर उतारता था पिछले हफ्ते की रस से भरी हड़िया
और टाँग देता था उसकी जगह नई
उतरने के पहले हँसिया से काट देता था वह
पतंग के उलझे धागों को
हिचकोले खाने लगती थी कटी-फटी पतंग इधर-उधर
बच्चे भागते थे पतंग के पीछे और
हम देखते थे उसे नीचे उतरते
सरसराते हुए
ख्वाहिश होती थी हमें भी
उस पेड़ पर चढ़ कर चाँद छूने की 

एक दिन उस जमीन के चारों तरफ बाउंड्री बनी
और फिर एक बड़ा सा मकान
कट गया ताड़ का पेड़
छोड़ दिया पासी ने वह रिहाइशी इलाका
सच हो गया हमारा समझना “ताड़ छोड़ो”  

पतंगों ने भी ढूँढ लिया अपना आशियाँ
टीवी एंटीना पर 
और चाँद जो ताड़ से झाँकता था अक्सर
चढ़ गया आसमाँ में और ऊपर
दफ़्न हो गई हमारी ख़्वाहिश
चाँद छूने की
उसके बाद..

    

Sunday, December 28, 2014

हादसा


उस दिन जो रेलवे स्टेशन पर बम ब्लास्ट हुए
बाल बाल बचा था मेरा भाई
एक दिन पहले ही
बम्बई से घर आया था वह

और वह जो बसों में आग लगाई गई थी
जिसमें बीस मरे और पचास गुमशुदा हुए
उस दिन मेरे चाचा ने न जाने क्या सोचकर
अपनी यात्रा मुल्तवी कर दी थी
उनकी ख़ैरियत सुन
हम सबों ने चैन की साँस ली थी

और हाँ, उफनती नदी में जो वह नाव पलटी थी
चालीस के चालीस नौका सवार तेज धार में
न जाने कहाँ लुप्त हो गए
वह घटना मेरे गाँव की थी...
पिताजी ने फोन कर के समाचार पूछे थे...
बहने वालों में कोई भी गोतिया-बिरादरी का न था
सभी अजनबी थे

आज अखबार में एक स्कूल की छत गिरने की खबर आई है
गम्भीर रूप से घायल करीब साठ मासूम बच्चे  
लड रहे मौत से
अपनी बची-खुची बेचैन साँसों के साथ
पर दे गए मुझको चैन की साँस,
‘थैंक गॉड’
मेरा बेटा स्कूल में पढने की उम्र पार कर चुका है

हादसों के इन मंजर से महफूज़
बीत रहे मेरे साल-दर-साल   
पर कल रात इन हादसों ने मुझे सोने न दिया
आँख में चुभती रहीं बम-ब्लास्ट से टूटे हुए शीशों की किरचें
जिस्म जलता रहा बस की जलती हुई टायर से
हाथ-पाँव मारता रहा उफनती नदी में रात भर
कान में आती रही बच्चों के कराहने की आवाज़

हादसों के शिकार ये अजनबी
क्यों हो गए मेरे इतने करीब ?


Tuesday, August 19, 2014

होस्टल मेस




हल्ला हंगामा
थालियों की खनखन
खाना देखकर
खाने को होता नहीं मन
  
दाल में पानी
तरकारी में मिर्ची
चावल में कंकर
जय जय शिव शंकर

फिर भी दौडता हूँ
होस्टल से मेस में
दो बजे तक ही मिलेगा
भात दाल तरकारी
याद आई महतारी.. .. 

Thursday, August 7, 2014

बेघरबार मुसाफिर हैं ये परिन्दे




रेलवे स्टेशन के प्लैटफॉर्म की शेड पर शोर मचाते परिन्दे
मुसाफिर की तरह ‘बिहेव’ करने लगे हैं
देर रात तक सोते नहीं हैं

आती जाती ट्रेनों से उतरते मुसाफिर की तरह
ये भी बेघरबार हैं
कहीं भी रात काट लेते हैं  

वक्त बेवक्त की परवाह किए बगैर
बीट करते रहते हैं

पटा है उनकी बीट से
आसनसोल का यह प्लैटफॉर्म