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Saturday, March 26, 2016

ख़्वाबों की दुनिया

चलो ख़्वाबों की दुनिया में चलें
आसमान की सैर करें
बादलों की ओट में लुका छिपी खेलें
किरणों के सिरे पकड़ रस्सी कूदें
बारिशों के छींटें मारें
बादलों ने जमा कर रखे हैं जो पानी
उसमें छपाक छपाक तैरें
धनक पर गीले कपड़े सुखाएँ   
रात होते ही आसमान की चादर ओढ़ 
सो जाएँ हम

ज़मीं पर
सबेरे से ही जद्दोज़हद के आलम में
बड़ी बेचैन कटती हैं रातें..!!


Wednesday, July 29, 2015

कलाम को सलाम

सपने हम पहले भी देखा करते थे
पर वे हमारे अपने कहाँ होते थे

दादाजी का सपना 
बडा होकर बनूँ मैं डॉक्टर
पिताजी का सपना
कि घर में होना चाहिए एक कलक्टर

उन सपनों की जडे नहीं थीं
पंख भी नहीं थे
जडें पनपी भी तो ज़मीं न थी
मिट्टी पकडने के लिए
ज़ंजीरों ने जकड रखा था पाँवों को
पंख फडफडाए भी तो धमनियों में रक्त नहीं था
कि पैदा हो परवाज़
और छू लें आसमान
उन सपनों के बोझ तले हम चलते रहे,
लुढकते रहे
घिसटते रहे

पर तभी उभरा
भारत के सुदूर तटवर्ती रामेश्वरम से  
एक ऐसा शख़्स
जिसके पास कहने को तो कुछ भी नहीं था
पर अनमोल ख़जाना का मालिक था वह
सपने वो भी देखता था
पर खुली आँखों से
गरीबी उसके लिए बाधक न थी,
साधक था वो,
गाँधी की तरह शरीर से नहीं,
मन से सशक्त था वह
जबीं पर लहराती ज़ुल्फों वाले इस शख़्स ने भी
हमें सपने दिखाए
ऊँची सोच के जादू की छडी उसने जैसे ही घुमाई    
उसके वे सपने
हो गए हमारे अपने

जब उसने कहा
’As a young citizen of India,
Armed with technology,
knowledge
and love for my nation,
I realize,
small aim is a crime.
तो भारत के युवाओं को मिली
आत्मविश्वास की एक ठोस ज़मीं
और आसमान छू लेने की ताकत

कलाम तुम मरे नहीं
केवल शरीर छोडा है तुमने...!!  


 27.07.2015

Thursday, March 26, 2015

मैं और मेरी तनहाई

(एक तज़मीन*) 

मैं और मेरी तनहाई
अक्सर ये बातें करते हैं

कि मौसम तबादले का आने ही वाला है
फिर ढूढूँगा मैं अपना कोई ठिकाना नया
किसी अजनबी शहर की अनजान गलियों में
फिर छूटेंगे कच्चे रंग कई चेहरों के  
और उभरेगी नई सूरतें ज़ेहन में    
फिर बदलेगा मेरा कमरा
किसी नए शहर या गाँव में
किसी दरबे की छत पर
बरसाती में
फिर चाँद झाँकेगा अक्सर खिडकियों से
और रातों की खामोश सदाएँ गूजेंगी  
फिर कटेगी तन्हा मेरी रातें
और करूँगा दीवारों से बातें
अपनापन होते ही उन दीवारों से
चल दूँगा फिर किसी अनजान रस्तों पर  
अगले मौसम में

मैं और मेरी तनहाई
अक्सर ये बातें करते हैं कि
सिलसिला त-आरुफ का लोगों से  
और रहना अजनबी ता-उम्र फिर भी 
ख़त्म होगा कभी तो एक दिन
तब हमारे दरम्यान कोई भी नहीं होगा
और मिलूँगा मैं अपने आप से
उस वक्त साथ होंगे सिर्फ हम दोनों
मैं और मेरी तनहाई...!!   

  
(तज़मीन : किसी और की शायरी लेकर आगे बढना, शामिल करना)   


Sunday, September 7, 2014

रात की आवाज़




उम्र हो चली है
आती है नींद अब किश्तों में  
पहले जैसा नहीं कि
एक बार बिस्तर पर लुढ़कूँ
तो सूरज सर पर चढ़ने पर ही उठूँ


अब कभी प्यास लगती है
तो नींद टूट जाती है
और कभी जमा होता है पानी 
पेट के नीचे
तो उठ बैठता हूँ
फिर देर तक सुनता हूँ
सदाएँ रात की

हैरत होती है मुझे...
यह खामोश रात भी समेटे हुए है
न जाने कितनी सदाएँ

कल रात नींद खुली
छत पर निकल आया
साफ सुनाई दे रही थी
दूर किसी ट्रेन के गुज़रने की आवाज़
उसकी धड़ड़-धड़ड़ सीधा दिल पर हथौड़े सी चोट करने लगी 
महसूस ये हुआ जैसे लाइन पर ही खटिया बिछी हो मेरी
अमूमन यह आवाज़ दिन में सुनाई नहीं देती

फिर सुनाई दी  
चिर्र्र्रर्रर्र्र्र्र्र्र्रर्र चर्र्र्र्रर्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र की आवाज... लगातार
झिंगुर गा रहे थे
स्तब्ध, मौन सुनता रहा उस गान को

तभी आसमान में कहीं नगाड़ा बजा
चिंहुक उठा था मैं
किसी ने कान में हौले से कहा
घबराओ नहीं, 'दौड़ते हुए दो बादल
टकरा गए हैं आपस में'

चीं चीं कर कोई चिड़िया फिर सर से गुज़री
जैसे कोई भटका हुआ मुसाफिर  
ढूँढता हो अपना ठिकाना 

टुर्र-टर्र टुर्र-टर्र ध्वनि आने लगी मेरे कानों में
समवेत स्वर में गा रहे थे स्वागत गान
बारिश की अगवानी में मेंडक

कमरे में लौटा
किर्र-कर्र किर्र-कर्र...करर-करर...
न जाने यह कैसी आवाज़ थी
आवाज की जानिब ढूँढता रहा
कभी लगता इस कोने से आई यह आवाज़
तो कभी आलमारी के पाए से निकलती लगती

रात भर आवाज़ की तलाश ज़ारी रही
सबेरे आँख भी भारी रही

दिखी बुक सेल्फ के पीछे काग़ज की कतरन
रात भर पढ़ डाली थी चूहे ने इक किताब
और कुतर डाला था उसके हर्फों को

और पलंग के पाए के पास 
दिखे लकड़ी के बुरादे
जो बता रहे थे दीमक के इरादे...!! 





Wednesday, August 13, 2014

गंगा सागर एक्सप्रेस



जयनगर से जब चलती है गंगा सागर एक्सप्रेस
एक बाँध सा खुलता जाता है हर स्टेशन पर
हहराता हुआ छूटता है
एक हल्फा लोगों का
उस बाँध से
गटक जाती है उस हल्फे को
अपने उदर में
चौदह डिब्बों की यह लम्बोदरा

रात भर का ठूसा हुआ
उगल देती है सियालदह स्टेशन पर  
अगली सुबह

एक सूनामी सा फैलता है एक पल के लिए
फिर दौडता फिरता है तूफान
शहर के बदन में फैली
छोटी-बडी नसों में
दिन भर...!!




Saturday, July 12, 2014

तकिया



1.

तकिए पर सर रखते ही नींद आ जाती है मुझे
फिर ख़्वाब आते हैं मेरी नींदों में
प्रेम भरे आलिंगन के
खुशबू सी घुल जाती है मेरी साँसों में...


पर कल लाख जतन किए
नींद उचटती रही पूरी रात
कभी तकिए में सर छुपाया 
तो कभी चिपकाए रहा सीने से देर तलक
कभी बाँहों में समेटे रहा तो
पाँवों में भी दाब कर रखा कुछ देर
न कोई ख़्वाब ही सुला सका मुझे
और न ही कोई ख़ुशबू सी घुली ज़ेहन में


देखा था मॉर्निंग वाक पर जाते हुए
फुटपाथ पर सोए हुए मजदूरों को
ईंटों के तकिए  
और खुली जमीन के बिछौने पर...

ईंटों पर सोने से सपने आते हैं ईंटों के
फिर वे उठा पाते हैं और भी ज्य़ादा ईंटें
सामने ही बनते अपार्टमेंट के लिए
जिसमें सोयेंगे लोग नर्म बिछावन पर
रख कर सर के नीचे मुलायम तकिया
जिसपर धागों की कढाई से लिखा होगा ‘स्वीट ड्रीम’,
फिर देखेंगे लोग ख़्वाब
प्रेम के...आलिंगन के...श्रृंगार के....!!    

2.


कभी सर छुपा कर रोती है मुझमें
तो कभी सीने से लगाए झूम कर गाती है
जब होती है तन्हा अपने कमरे में

कभी बाँहों में समेटती है मुझे  
गोदी में रख कर ख्वाब बुनती है कभी
रूठने मनाने के खेल में 
मुक्के भी बरसाती है मुझपर अक्सर 
काले घने मेघ के बादल सा बिखरा देती है मुझ पर
कभी अपनी ज़ुल्फें खोलकर
घोल देती है खुशबू मेरे दिलो-दिमाग पर
जब कभी भीगे बालों से टपका देती है पानी मुझपर

पर हर तकिए की किस्मत में नहीं होती
दुल्हन की ये नजाकत
सेठ जी जब पाँवों में  
दबोचते हैं मुझको
तो निकल जाती हैं साँसें मेरी...!!