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Sunday, November 8, 2015

आख़िरी रात



आज की रात आख़िरी है मधुबनी में मेरी यह रात
फिर न होगी वह रातों को छत पर टहलने की बात

वो चाँद का छत की रेलिंग पकड कर बारहा टँगना
कभी टंकी के पीछे औंधे मुँह फिसल कर गिरा पाना
उतर आना मेरे कमरे में रोशनदान से अक्सर
टाइल्स की फर्श पर बैठ टकटकी बाँध कर तकना
वो हमसफर बन ट्रेन के फिर साथ ही चलना
मेरे सुख-दुख का साथी बन हमेशा राजदां रहना

सबेरे  ट्रेन की आवाज़ सुन कर मेरा जगना
इक ख़याल कि कोई आएगा दिल में कहीं बसना
दरवाज़े पर हर आहट से फिर चौंक कर उठना
मायूस हो जाना, चाँद की राह फिर तकना

कितना तन्हा गुज़रेगी कल से उस घर के छत की रात
बहुत रोएगा मेरे बग़ैर वो मधुबनी का चाँद ...!! 


Friday, September 12, 2014

मधुबनी का चाँद





उतर आता है आसमाँ के ज़ीने से
मेरे कमरे में अक्सर मधुबनी का चाँद

या चढकर आसमाँ के ऊपरी माले से
रातभर ख़ूब चमकता है मधुबनी का चाँद

कुछ ही दूरी पर हिमालय पर्वत है
उसकी चोटी से चमकता है मधुबनी का चाँद

धनबाद जब भी जाता हूँ किसी छुट्टी में
साथ आ जाता है मेरे मधुबनी का चाँद  

ट्रेन की खिडकी से जब भी देखा है  
हमसफर साथ चलता है मधुबनी का चाँद

मुख्तलिफ है यह दूसरी जगहों से 
अच्छा लगता है मुझे मधुबनी का चाँद





मधुबनी का चाँद




चाँद दिल्ली में डरा सहमा लगा है मुझे
छिप छिप कर रहता है ऊँची इमारतों के पीछे
चाँद पटना में भी देखे हैं मैंने
ताड के पेडों से झाँकते अक्सर
धनबाद में कम ही दिखता है मेरे अपार्टमेंट से

खिल कर निकलता है मधुबनी का चाँद 
उतर आता है आसमाँ के ज़ीने से मेरे कमरे में अक्सर
या चढ जाता है आसमाँ के सबसे ऊपर माले में
यूँ चमकता है फिर पूरी रात और बिखेरता है दुधिया रौशनी 
जैसे हिमालय की चोटी पर लहरा रहा हो परचम

कई बार ऐसा लगा है मुझे
जैसे छत के ऊत्तर
पास ही कैलाश हो
और दमक रहा हो चाँद
शिव के मस्तक से  

अच्छा लगता है मुझे मधुबनी का चाँद
मुख्तलिफ है यह दूसरी जगहों से  




Friday, December 13, 2013

मधुबनी

मधुबनी

1. 
न ऊँची दूकान,
न फीका पकवान
लोगों के मुँह में पान
माछ और मखान

मन्दिरों के घंटे
मस्जिदों के अजान
मौलवी की तकरीरें
पंडितों के व्याख्यान

गलियाँ ही गलियाँ
गलियों में बहते नाले
फैले कचरे, अवरूद्ध बहान
एक दूसरे से सटे मकान
घूमते सूअर, साँढ और श्वान

फिर भी कहते हैं सुजान
है इसकी एक अलग पहचान  
प्राचीन संस्कृति और वैदिक ज्ञान
की अब तक खोई न शान  
सौराठ सभा, मधुबनी पेंटिंग
गूँजे चहुँ ओर विद्यापति गान
है धन्य नगर मधुबनी महान


2.

पाँच सौ पचहत्तर गलियों का यह शहर
ओढे हुए है अभी भी गाँव का दुशाला  
डरता है शहर की आबो-हवा से
और शहर में तब्दील होने से  

गलियों से बाहर निकलते ही
शुरु हो जाता है
गाँव का विस्तार
जलकुम्भी, सिंघाडा या मखाना के  
पोखर और तालाब

दूर दूर तक खेत ही खेत
कुश के लहलहाते पौधे
आमों का जंगल
बाँसों का झुरमुट
अक्सर दिख जाता
दूर दिशा से आए
खेतों में उतरे पक्षी
या उडते बगुले एकजुट  
माथे पर झापी उठाए
या अपनी झोपडी को गोबर से लीपते
या दीवारों पर बेल-बूटा बनाती  
माता जानकी की याद दिलाती
गाँव की महिलाएँ
इस शहर का नाम है मधुबनी

आओ इसे शहर का जामा पहनाएँ
क्यों न इसे हनीबनी कह कर बुलाएँ  






28.11.2013  

Tuesday, February 7, 2012

पटना



अलसाया सा यह शहर
करवटें बदलने लगा है
धूल से सने जिस्म को
झाड पोंछ उठ खडा होने को बेताब
बदन के अलग-अलग हिस्सों को
जोडने वाले फ्लाई ओवरों पर
सुबह-सुबह दफ्तरों के लिए भागम-भाग करते लोग
मोटर-साइकिल और दौडती भागती अनगिनत गाडियाँ
मुँह ढापे और बाँहों तक दस्ताने चढाए
स्कूटी चलाती लडकियाँ.....
शहर अचानक ही जवान हो गया
जैसे उसने कॉस्मेटिक सर्जरी कराई हो...

गोलघर से देखने पर अब यह वीरान नहीं दीखता
ऊँची-ऊँची इमारतें सर उठाए दिखने लगी हैं
स्कूल की बसों की कतारें
रोज़गार के लिए दूर-दराज से आए लोगों का हुजूम
शॉपिंग मॉल और मल्टीप्लेक्स सिनेमा में जाते लोग
मूँगफली खाते और चाय की दुकान पर गपियाते लोग
चकाचौंध रात में गाँधी मैदान की आगोश में लिपटे
और फुटपाथ पर कुत्तों के साथ सोए रिक्शे और ठेले वाले
स्टेशन के पास ही
मंदिर और मस्जिद का एक साथ ही सबेरे उठना
यह पटना है पटना
जिसे गुमान है कि यहाँ कभी नहीं घटी
मानवता को शर्मसार करने वाली कोई घटना

बस एक दर्द लिए कराहता है यह शहर ..
बढती भीड और मलबों से घबरा कर
गंगा ने अपने घाटों से मुँह मोड लिया है