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Friday, October 30, 2015

ट्रेन में रात का सफर


ट्रेन चलती रही सारी रात
तुम बहुत याद आए सारी रात

धड-धड धडड घूमते रहे पहिए
दिल धडकता रहा सारी रात

खिडकी वाली बर्थ पर सामने
बतियाते रहे दो जवाँ सारी रात

सुन लेता जो उनकी बातें कभी
मैं लजाता रहा सारी रात

करवटें मैं बदलता रहा  
नींद आई नहीं सारी रात

ट्रेन में नींद आती कहाँ
बत्ती आँखों पर जली सारी रात

ले ना जाए कोई जूते कहीं 
कनखियाता रहा सारी रात

कल से होगी फिर वही ज़िंदगी
सोचते कट गई सारी रात

ज़िंदगी का ये सफर है अजब
मैं न सोया कभी सारी रात  


30.10.2015




Wednesday, September 9, 2015

दिनचर्या




रोज सबेरे एक दीया सा जलता है   
रौशन होती हैं आँखें मेरी
लौ धीरे-धीरे होती जाती है तेज
जैसे-जैसे सूरज चढता  है   

इक हौसला निखरता है 
उस लौ की आँच में
और तन तपता है

शाम ढलते ही
पडने लगती है लौ मद्धम मद्धम
बुझ जाता है दिल का चराग
रात होते ही

अँधेरे तन्हा कमरे में
फिर समेटता रहता हूँ 
उन बुझे हौसलों की राख
और सहेजता हूँ उस राख में दबी
कोई छोटी सी चिनगारी
के जल उठे फिर से दीया
अगली सुबह .!!

02.09.2015

Friday, March 13, 2015

वेटिंग रूम


वेटिंग रूम में बैठा हूँ
सामने ही स्वीच बोर्ड है
मची है होड मोबाइल चार्ज करने की 
एक ही सॉकेट में दो दो चार्जर के पैर घुसे हुए हैं
जैसे एक दूसरे के ऊपर लदे हुए
लोग चढे रहते हैं रेल के डब्बों में

लकडी के पार्टीशन से घिरा हुआ है एक कमरा
जिसके बाहर टेबुल कुर्सी लगाए
बैठा है ऊँघता हुआ एक आदमी
नींद में भी वसूल लेता है वह दो रुपए
जो भी उस कमरे से निकलता है उनसे

देख रहा हूँ आती जाती ट्रेनों को
घर से चला था तो मैच चल रहा था टीवी पर  
एक मैच सा यहाँ भी चलता मालूम हो रहा है
ट्वेंटी-ट्वेंटी का
कुल बीस ट्रेनें आती हैं रात में आसनसोल
रनें बनाती हैं ट्रेनें
एक जाती है तो दूसरी आ जाती है
कोई ज़ीरो पर आउट नहीं होती
अच्छे फॉर्म में हैं सभी
हर ट्रेन के बल्ले से  
रनों का अम्बार निकलता है
जब उगलती है वह लोगों का हुजूम 
प्लैटफॉर्म भी थकने का नाम नहीं लेता
गेंदे डालता रहता है ट्रेनों को 

सामने ही कोई ट्रेन रुकी है
रंगदारी वसूल रहे हैं आरपीएफ के जवान
भीड लगी है ‘मे आई हेल्प यू’ काउंटर पर  
बडे ही मनोयोग से आरक्षण चार्ट का अध्ययन कर रहे हैं टीटी बाबू 
मालूम है अनुभवी टीटी बाबू को कि    
कितने रन पर आउट होगा बर्थ की चाहत रखने वाला   
दरभंगा का वह नौजवान
जिसकी ऊँगलियों में लगे नेल पॉलिश और आलता से रंगे पैर
साफ बता रहे हैं कि
लौट रहा है वह पहली होली मना कर
अपनी ससुराल से
  
और आरपीएफ के जवानों को भी
कि उतरेंगी कहाँ
टॉयलेट में ठूँसी कोयले की बोरियाँ...

यह मैच जीत-हार के बिना खत्म हो जाएगा  
यह मैच ‘टाई’ होगा
फिक्स है यह मैच ..!!  
       

रेलवे प्लैटफॉर्म



1.       

रतजगा करता है
आसनसोल का प्लैटफॉर्म

रात आधी होने को आई पर  
चहल पहल है
जो थमने का नाम ही नहीं ले रही

अभी मैं जिस ट्रेन से उतरा
एक जन-सैलाब छूटा है उस ट्रेन से
भर गया चप्पा-चप्पा प्लैटफॉर्म का उस सैलाब से

इस सैलाब के कई हिस्से होंगे
कुछ को सोख लेगी दूसरी ट्रेनें  
कुछ यहीं बह जायेंगे
मेरे दुखों की तरह   

2.       

खोँमचे वाले बेच रहे हैं पूरी-सब्जी खिडकियों से
ताबडतोड बिक रहा है डिम और बिसलेरी बोतल 
जिसे उठाया गया है रेलवे ट्रैक से ही
और भरा गया है प्लैटफॉर्म पर ही

बन आयी है ‘तिरंगा’ और गुटखा बेचने वालों की
भर मुँह पीक रख पायदान पर खडे
सफर काट देने वाले यात्रियों के बीच

इसी हुजूम के बीच दौड रहे हैं
वेटिंग रूम में, सीढियों के नीचे, 
खाली रेलवे ट्रैक पर या खोँमचे वालों के ठीक बगल से
मुस्टंडे चूहे
निडर, निर्भीक, निरापद

परिन्दों की भी बदल गई है दिनचर्या
अब ये शाम ढले नहीं सोते
आधी रात होने को आई पर 
अफरा-तफरी मची हुई है इनके बीच भी   
प्लैटफॉर्म नम्बर तीन और चार की शेड पर जगह पाने के लिए   
शोर मचाते इन परिन्दों की बीट से 
पटा पडा है प्लैटफॉर्म की जमीन

देख रहा हूँ इक तमाशा जीवन का
हंगामा सा है
हडबडी है
सफर में तो सभी हैं   
पर मुसाफिर कोई नहीं दिखता..!!  


अंतहीन यात्रा



छुट्टियाँ बिता कर लौट रहा हूँ मैं
बदलना पडता है ट्रेन आसनसोल स्टेशन पर
जिस ट्रेन से मुझे जाना है वह देर रात आएगी सियालदह से 

वेटिंग रूम में बैठा गिन रहा हूँ आती-जाती ट्रेनों को
एक हुजूम उतरता है हर ट्रेन से
चढ जाता है एक और उतना ही 
न ट्रेन खाली होती है 
न प्लैटफॉर्म

सिलसिला रात भर चलेगा 
हिसाब बराबर करने का   
रात भर दौडेगी ट्रेनें अँधेरे में
पहुँच जाएगी फिर अपनी-अपनी मंजिल मुँह अँधेरे ही
सुबह की अलसायी नींद लेने के लिए अंतिम पडाव पर
कि फिर चलना होगा एक लम्बी दूरी
उसे भी और
मुझे भी
सूरज के सर चढते ही ...!!